प्रतिशोध। क्रोध। धार्मिकता।
तीन व्यक्ति, जो नियति से एक-दूसरे से बंधे हैं, लेकिन अपने कर्मों से अलग हो चुके हैं। अंततः कौन बचेगा ?
नरसिंह के मन में पहले कभी इतना क्रोध नहीं उमड़ा था।
हिरण्यकश्यप की मृत्यु के बाद, अब वह काश्यपुरी पर राज कर रहा है और अपना सारा समय केवल प्रतिशोध की योजना बनाने में बिता रहा है। उसने शपथ ली है कि वह चेनचेन की मृत्यु के लिए जिम्मेदार इंद्रदेव का अंत कर देगा।
जब प्रह्लाद को यह एहसास होता है कि नरसिंह का क्रोध सीमाएं लांघ रहा है, तो उसे समझ आता है कि इससे पहले कि नरसिंह चारों ओर अराजकता फैल और भी मासूमों की जान ले ले और जाए, उन्हें रोकना ही होगा।
लेकिन क्या प्रह्लाद वह कर पाएगा जो आवश्यक है? क्या वह स्वयं को अंधकार में खोए बिना अपने एकमात्र पिता तुल्य व्यक्ति का वध कर पाएगा?
बेस्टसेलिंग लेखक केविन मिसाल की नरसिंह त्रयी की यह अंतिम पुस्तक, भगवान नरसिंह और प्रह्लाद की हृदयस्पर्शी, प्रेरणादायक और रोमांचकारी गाथा का समापन करती है।






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