कर्णपुत्र और अस्त्र’ के पहले भाग को आपने जो अभूतपूर्व प्रतिसाद दिया, उसके लिए आप सभी का मनःपूर्वक धन्यवाद। पहले भाग के लिए कई पाठकों ने लिखित समीक्षाएं भेजी। उन समीक्षाओं के माध्यम से मुझसे कुछ प्रश्न भी पूछे गए। उनमें सबसे अधिक पूछे जाने वाले प्रश्न थे सुवेध के जन्म का रहस्य क्या है? वह वास्तव में किसका पुत्र है ? नदी के किनारे उससे कौन बात करता है? इत्यादि। और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह आया कि धर्माक्षी के साथ उसका विवाह दूसरे भाग में होगा या नहीं ?
प्रस्तावना में यह स्पष्ट करने के बाद भी कि यह उपन्यास काल्पनिक है, कई लोगों को लगा कि यह सत्य घटना पर आधारित है या शायद पढ़ते समय उन्हें ऐसा महसूस हुआ। वहीं, एक पारखी पाठक ने तो स्पष्ट रूप से कहा कि दूसरा भाग पहले भाग जितना ही, बल्कि उससे भी श्रेष्ठ होना चाहिए। तो हमारे एक सहृदय मित्र ने यह तक कह दिया कि, “बाकी सारे काम एक तरफ रखिए और पहले दूसरा भाग पूरा कीजिए।”
ऐसे सैकड़ों फीडबैक से मुझे दूसरा भाग लिखने की प्रेरणा मिली। मुझे विश्वास है कि दूसरा भाग भी आपको उतना ही पसंद आएगा, बल्कि यह आपके दिल को और अधिक छुएगा। मुझे आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।






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